शुक्रवार, 27 मई 2011

थार में प्यास


जब लोग गा रहे थे
पानी के गीत
हम सपनों में देखते थे
प्यास भर पानी।
समुद्र था भी
रेत का इतराया
पानी देखता था
चेहरों का
या फिर
चेहरों के पीछे छुपे
पौरूष का ही
मायने था पानी।

तलवारें
बताती रहीं पानी
राजसिंहासन
पानीदार के हाथ ही
रहता रहा तब तक।

अब जब जाना
पानी वह नहीं था
दम्भ था निरा
बंट चुका था
दुनिया भर का पानी
नहीं बंटी
हमारी अपनी थी
आज भी थिर है
थार में प्यास।

16 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण रचनावां...शानदार ब्लॉग.............

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  2. प्रणाम !
    नए ब्लॉग से परिचय करवाने का आभार ! '' थिर है अभी थार में पानी '' तीन द्रश्यों में पानी को चित्रित कर दिया . कही रेगिस्तान के आँचल में , कही पौरुष रूप में तो एक जामने में पानी के लिए ठाकुरों के कुवो पे होती जंग में ! मगर पानी अभी भी थिर है .! साधुवाद
    सादर !

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  3. ओम पुरोहित जी कई वर्ष पहले सूरतगढ़ में रहा हूँ और आपसे शायद भेंट भी हुई है, बहुत अच्छा लगा आज आपका ब्लाग देख कर।

    www.vyomkepar.blogspot.com

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  4. तलवारें
    बताती रहीं पानी
    राजसिंहासन
    पानीदार के हाथ ही
    रहता रहा तब तक।

    भावपूर्ण प्रस्तुति.... सुंदर रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. Om jee , aapki rachna ,aapka blog uttam hai . bahut prabhvi va sundar shaili , aapko shubhkamna

    उत्तर देंहटाएं
  6. Aapki lekhan-shaili prabhavit karti hai , sundar blog bhi hai , achchha laga aapko padhana.

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  7. aapke blog per pehli baar aaye hooh accha laga hamara teesra blog kyun nahi dekh sake aap bataye hum dakhte hai kya samasya hai?

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  8. यह सम्मान की बात हे की आपको "श्री छोटी-खाटू हिंदी पुस्तकालय" द्वारा २०११ का महा कवी कन्हैया लाल सेठिया मायड़ भाषा सम्मान दिया जायेगा |
    मेने आपके बारे में थोडा यंहा लिखा हे ,मार्गदर्शन के लिए पधारे |
    http://vijaypalkurdiya.blogspot.com/2011/10/blog-post.html

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  9. "नहीं बंटी
    हमारी अपनी थी
    आज भी थिर है
    थार में प्यास।"

    अनुपम !

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  10. राजस्थान की संस्कृति उतर आई है आपकी कविता में

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  11. ओम जी
    बहुत ही जानदार रचना ... वाकई राजस्थान की मिट्ठी की खुशभू है आपकी कविता में ..

    बधाई .

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  12. अब जब जाना
    पानी वह नहीं था
    दम्भ था निरा
    बंट चुका था
    दुनिया भर का पानी
    नहीं बंटी
    हमारी अपनी थी
    आज भी थिर है
    थार में प्यास।
    .....समय के साथ इंसान कितना बदल जाता है पर यदि कुछ नहीं बदलता है तो वह प्रकृति का स्वभाव।
    बहुत बढ़िया रचना

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